Friday, August 3, 2018

असम एनआरसी : तस्लीमा ने ममता से पूछा, ‘मुझे जब बंगाल से बाहर किया गया तब आप कहां थी ?

नई देहली : असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर सडक से लेकर संसद तक हंगामा बरपा है ! सत्तापक्ष जिन ४० लाख लोगों का नाम एनआरसी में नहीं है उन्हें नागरिकता साबित करने के लिए मौका देने की बात कही है। वहीं विपक्ष का कहना है कि, सरकार का इरादा ठीक नहीं है, अपने ही घर में इतने लोगों को बेघर किया जा रहा है। इस बीच बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा है कि घुसपैठिए अवैध नहीं होते हैं।
तस्लीमा ने राजनेताओं पर निशाना साधते हुए कहा, ”भारत में काफी मुस्लिम हैं। भारत को पडोसी देशों से और मुस्लिमों की आवश्यकता नहीं है। परंतु समस्या यह है कि भारतीय राजनेताओं को इनकी आवश्यकता है !”
भारत में निर्वासित तस्लीमा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कठघरे में खडा करते हुए कहा, ”यह देखकर अच्‍छा लगा कि ममता जी ४० लाख बांग्‍ला बोलनेवालों के लिए इतनी ज्‍यादा सहानुभूति रखती हैं। उन्‍होंने यहां तक कह दिया है कि वह असम बाहर किए जानेवाले लोगों को वह शरण देंगी। उनकी यह सहानुभूति तब कहां थी जब उनकी विरोधी पार्टी ने मुझे पश्चिम बंगाल से बाहर कर दिया था ?”
तस्लीमा ने कहा, ”ममता जी के अंदर सभी बेघर बांग्‍ला बोलनेवालों के लिए के सहानुभूति नहीं है। यदि उनके अंदर होता तो उनके अंदर मेरे लिए भी होती और उन्‍होंने मुझे भी पश्चिम बंगाल में आने की अनुमति दी होती !”
आपको बता दें तस्लीमा किताबों को लेकर विवादों में रही हैं। मुस्लिम संगठनों ने बांग्लादेश में तस्लीमा का विरोध किया था। जिसके बाद वो भारत आ गई और पश्चिम बंगाल में शरण ली। परंतु साल २००७ में उनके लेखन को लेकर कोलकाता में हिंसक प्रदर्शन हुआ। तब की लेफ्ट सरकार ने उन्हें राज्य से बाहर जाने के लिए कहा। अब तस्लीमा ने इसी बहाने ममता बनर्जी पर निशाना साधा है !
स्त्रोत : एबीपी न्यूज

असम एनआरसी : तस्लीमा ने ममता से पूछा, ‘मुझे जब बंगाल से बाहर किया गया तब आप कहां थी ?


नई देहली : असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर सडक से लेकर संसद तक हंगामा बरपा है ! सत्तापक्ष जिन ४० लाख लोगों का नाम एनआरसी में नहीं है उन्हें नागरिकता साबित करने के लिए मौका देने की बात कही है। वहीं विपक्ष का कहना है कि, सरकार का इरादा ठीक नहीं है, अपने ही घर में इतने लोगों को बेघर किया जा रहा है। इस बीच बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा है कि घुसपैठिए अवैध नहीं होते हैं।
तस्लीमा ने राजनेताओं पर निशाना साधते हुए कहा, ”भारत में काफी मुस्लिम हैं। भारत को पडोसी देशों से और मुस्लिमों की आवश्यकता नहीं है। परंतु समस्या यह है कि भारतीय राजनेताओं को इनकी आवश्यकता है !”
भारत में निर्वासित तस्लीमा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कठघरे में खडा करते हुए कहा, ”यह देखकर अच्‍छा लगा कि ममता जी ४० लाख बांग्‍ला बोलनेवालों के लिए इतनी ज्‍यादा सहानुभूति रखती हैं। उन्‍होंने यहां तक कह दिया है कि वह असम बाहर किए जानेवाले लोगों को वह शरण देंगी। उनकी यह सहानुभूति तब कहां थी जब उनकी विरोधी पार्टी ने मुझे पश्चिम बंगाल से बाहर कर दिया था ?”
तस्लीमा ने कहा, ”ममता जी के अंदर सभी बेघर बांग्‍ला बोलनेवालों के लिए के सहानुभूति नहीं है। यदि उनके अंदर होता तो उनके अंदर मेरे लिए भी होती और उन्‍होंने मुझे भी पश्चिम बंगाल में आने की अनुमति दी होती !”
आपको बता दें तस्लीमा किताबों को लेकर विवादों में रही हैं। मुस्लिम संगठनों ने बांग्लादेश में तस्लीमा का विरोध किया था। जिसके बाद वो भारत आ गई और पश्चिम बंगाल में शरण ली। परंतु साल २००७ में उनके लेखन को लेकर कोलकाता में हिंसक प्रदर्शन हुआ। तब की लेफ्ट सरकार ने उन्हें राज्य से बाहर जाने के लिए कहा। अब तस्लीमा ने इसी बहाने ममता बनर्जी पर निशाना साधा है !
स्त्रोत : एबीपी न्यूज

कौन हैं रोहिंग्या प्रवासी और भारत में क्यों हो रही है उनकी इतनी चर्चा . . .


सरकार ने लोकसभा में बताया कि भारत में रह रहे कुछ रोहिंग्या प्रवासी गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल हैं ! साथ ही यह भी साफ किया कि रोहिंग्या को ‘शरणार्थी’ का दर्जा नहीं दिया गया है बल्कि वे ‘अवैध प्रवासी’ हैं !
आखिर कौन हैं ये रोहिंग्या प्रवासी ? ये भारत कैसे पहुंचे और यहां क्यों आए ? रोहिंग्या म्यांमार से भागकर बांग्लादेश क्यों जा रहे हैं ? इन्हें अब तक म्यांमार में नागरिकता क्यों नहीं मिली ? नोबेल विजेता आंग सान सू ची दुनिया भर में मानवाधिकारों के प्रति अपनी मुखर आवाज के लिए जानी जाती हैं। म्यांमार में अब उनकी पार्टी की ही सरकार है फिर भी वह रखाइन प्रांत में रोहिंग्या लोगों पर हो रहे जुल्म पर चुप क्यों हैं ? आइए जानते हैं इस बारे में सब कुछ . . .

रखाइन प्रांत का इतिहास

रखाइन म्यांमार के उत्तर-पश्चिमी छोर पर बांग्लादेश की सीमा पर बसा एक प्रांत है, जो ३६ हजार ७६२ वर्ग किलोमीटर में फैला है। सितवे इसकी राजधानी है। म्यांमार सरकार की २०१४ की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार रखाइन की कुल जनसंख्या लगभग २१ लाख है, जिसमें से २० लाख बौद्ध हैं। यहां लगभग २९ हजार मुसलमान रहते हैं।

रोहिंग्या कौन हैं ?

म्यांमार की बहुसंख्यक जनसंख्या बौद्ध है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य की लगभग १० लाख की जनसंख्या को जनगणना में शामिल नहीं किया गया था। रिपोर्ट में इस १० लाख की जनसंख्या को मूल रूप से इस्लाम धर्म को माननेवाला बताया गया है। जनगणना में शामिल नहीं की गई जनसंख्या को रोहिंग्या मुसलमान माना जाता है। इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। हालांकि वे पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहे हैं।
रखाइन स्टेट में २०१२ से सांप्रदायिक हिंसा जारी है। इस हिंसा में बडी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। बडी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पडता है। लाखों की संख्या में बिना दस्तावेजवाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था।

रखाइन प्रांत से क्यों भागे रोहिंग्या ?

म्यांमार में मौंगडोव सीमा पर २५ अगस्त २०१७ को रोहिंग्या चरमपंथियों ने उत्तरी रखाइन में पुलिस नाके पर हमला कर १२ सुरक्षाकर्मियों को मार दिया था। इस हमले के बाद सुरक्षा बलों ने मौंगडोव जिला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया और तब से म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन जारी है !
आरोप है कि सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों को वहां से खदेड़ने के मकसद से उनके गांव जला दिए और नागरिकों पर हमले किए। इस हिंसा के बाद से अब तक लगभग चार लाख रोहिंग्या शरणार्थी सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। म्यामांर के सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के संगीन आरोप भी लगे। सैनिकों पर प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या जैसे आरोप हैं। हालांकि सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था।

बांग्लादेश ने विरोध जताया

बांग्लादेश ने रोहिंग्या लोगों के अपने देश में घुसने पर कडी आपत्ति जताई और कहा कि परेशान लोग सीमा पार कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में यहां आ रहे हैं। बांग्लादेश ने कहा कि सीमा पर अनुशासन का पालन होना चाहिए। बांग्लादेश अथॉरिटी की तरफ से सीमा पार करनेवालों को फिर से म्यांमार वापस भेजा गया।
लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बांग्लादेश के इस कदम की कडी निंदा की और कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी के रूप में स्वीकार नहीं करता। रोहिंग्या और शरण चाहनेवाले लोग १९७० के दशक से ही म्यांमार से बांग्लादेश आ रहे हैं !

आखिर नोबेल विजेता आंग सान सू ची ने क्यों साधी चुप्पी ?

म्यांमार में २५ सालों के बाद २०१६ में चुनाव हुआ था। इस चुनाव में नोबेल विजेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली थी। संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थीं। सू ची स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं। माना जाता है कि सत्ता की वास्तविक कमान सू ची के हाथों में ही है। हालांकि देश की सुरक्षा सेना के हाथों में है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार से सवाल पूछा जा रहा है कि रखाइन प्रांत में पत्रकारों को क्यों नहीं जाने दिया जाता। इस पर म्यांमार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी गलत रिपोर्टिंग की जाती है। यदि सू ची अंतराष्ट्रीय दवाब में झुकती हैं और रखाइन स्टेट को लेकर कोई विश्वसनीय जांच कराती हैं तो उन्हें सेना से टकराव का जोखिम उठाना पड़ सकता है। उनकी सरकार खतरे में आ सकती है।
आंग सान सू ची पर जब इस मामले में दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा था कि रखाइन स्टेट में जो भी हो रहा है वह ‘रूल ऑफ लॉ’ के तहत है। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आवाज उठ रही है। म्यांमार में रोहिंग्या के प्रति सहानुभूति न के बराबर है। रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सेना की कार्रवाई का म्यांमार में लोगों ने जमकर समर्थन किया है !

संयुक्त राष्ट्र ने स्थिति पर चिंता जताई है

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने कहा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान ‘मानवीय आपदा’ का सामना कर रहे हैं। गुटेरेश ने कहा कि रोहिंग्या ग्रामीणों के घरों पर सुरक्षा बलों के कथित हमलों को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने म्यांमार से सैन्य कार्रवाई रोकने की भी अपील की थी।
वहीं म्यांमार की सेना ने आम लोगों को निशाना बनाने के आरोप से इनकार करते हुए कहा कि वह चरमपंथियों से लड़ रही है।
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि बांग्लादेश में अस्थायी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को मिल रही मदद नाकाफी है !
स्त्रोत : अमर उजाला

Wednesday, August 1, 2018

रोहिंग्याओं की घुसपैठ रोकने के लिए तैनात किए गए बीएसएफ, असम राइफल्स के जवान – गृहमंत्री राजनाथ सिंह


नई देहली : संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को रोहिंग्‍या शरणार्थियों का मुद्दा उठाया गया। लोकसभा में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने रोहिंग्या को लेकर राज्यों के लिए एडवाइजरी जारी की है। राजनाथ सिंह ने कहा कि राज्य सरकारों से आग्रह किया है कि वे राज्य में रोहिंग्याओं की संख्या आदि के बारे में वे गृह मंत्रालय को इसकी सूचना दें। गृह मंत्रालय ये जानकारी विदेश मंत्रालय को देगा। विदेश मंत्रालय म्यांमार के साथ इनको डिपोर्ट करने पर बातचीत करेगा।

रोहिंग्या के घुसपैठ को रोकने के लिए बीएसएफ और असम राइफल्स तैनात

लोकसभा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बताया कि रोहिंग्या के घुसपैठ को रोकने के लिए बीएसएफ और असम राइफल्स के जवान तैनात किए गए हैं। कोशिश की जा रही है कि भारत में अब और रोहिंग्या घुसपैठ न कर पाएं। भारत में भी ४०,००० रोहिंग्या हैं !

भारत शरणार्थियों को भगाने में यकीन नहीं रखता

सासंद जुगल किशोर शर्मा ने पूछा कि जम्मू से रोहिंग्या कब बाहर होंगे ? इसका जवाब किरन रिजिजू ने दिया। उन्‍होंने कहा, ‘रोहिंग्या भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। सबसे ज्यादा रोहिंग्या जम्मू-कश्मीर में है। इनको सुरक्षित म्यांमार भेजने के लिए प्रयास सरकार कर रही है। राज्य सरकारों के साथ इसपर बातचीत जारी है। भारत शरणार्थियों को भगाने में यकीन नहीं रखता, लेकिन एक रेग्युलेटरी जारी करने में क्या बुराई है। हम विदेश मंत्रालय के माध्यम से रोहिंग्या को सुरक्षित रुप से म्यांमार भेजने के लिए काम कर रहे हैं लेकिन विपक्ष इसका विरोध कर रहा है। हम पहले अपने देश की सुरक्षा चाहते हैं।

भारत में भी ४०,००० रोहिंग्या

लोकसभा में टीएमसी सांसद सुगत बोस ने सवाल किया कि विदेश मंत्रालय बांग्लादेश में रोहिंग्या के लिए ऑपरेशन इंसानियत चला रहे हैं। भारत में भी ४०,००० रोहिंग्या हैं, तो क्या हम इंसानियत सिर्फ उन्हीं के लिए दिखाएंगे जो बांग्लादेश में हैं ? इस पर किरन रिजजू ने कहा कि देश के सभी हिस्सों में अलग-अलग जगहों पर प्रवासी है जिनको नागरिकता एक्ट के प्रावधानों के तहत देखा जाता है और नागरिकता देना या न देना इस एक्ट के प्रावधानो पर निर्भर है !
स्त्रोत : जागरण

Thursday, July 26, 2018

रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में लंबे समय तक रहने की अनुमति नहीं : किरण रिजिजू


नई देहली : केंद्र सरकार ने साफ किया है कि रोहिंग्या मुसलमान गैरकानूनी प्रवासी हैं और उन्हें देश में ज्यादा दिन तक नहीं रहने दिया जाएगा । केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने बुधवार को साफ-साफ कहा कि इस मामले में सरकार का नजरिया सबके सामने है ।
रिजिजू ने कहा रोहिंग्या गैरकानूनी प्रवासी हैं और उन्हें भारत में फलने-फूलने का मौका नहीं दिया जाएगा । इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंहने भी कहा है कि केंद्र ने सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि भारत में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के पास भारतीय कागजात न हो इसकी पूरी जांच की जाए ।
राजनाथ ने कहा, ‘हमने सभी राज्यों को आदेश दिया है कि किसी भी रोहिंग्या मुसलमान के पास भारतीय कागजात नहीं हो ताकि हम म्यांमारसे और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज म्यांमार के विदेश मंत्री से बात कर सके ।’
पिछले महीने केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर समेत सभी राज्य सरकारों को एक पत्र लिखकर उनसे गैरकानूनी प्रवासियों को देश में घुसने से रोकने को कहा था । बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना ने हाल की भारत यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा की थी और कहा था कि भारत रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार भेजने में अहम भूमिका निभा सकता है ।
बता दें कि, रोहिंग्या म्यांमार में अल्पसंख्यक माने जाते हैं । पिछले साल अगस्त में म्यांमार सेना की कार्रवाई के बाद हजारों रोहिंग्या शरणार्थी वहां से भाग गए थे । बाद में वे भारतीय शरणार्थी शिविरों में आकर रहने लगे । रोहिंग्या जम्मू, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, देहली-एनसीआर और राजस्थान में रह रहे हैं ।
स्त्रोत : नवभारत टाइम्स

Wednesday, July 11, 2018

शिमला : रोहिंग्याओं को रखा जा रहा काम पर, परंतु इस बात से बेखबर है पुलिस प्रशासन


शिमला : रोहिंग्याओं को भारत सरकार शरणार्थी न मानते हुए देश से बाहर भेजना चाहती है । वहीं, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में इन्हें काम पर रखा जा रहा है । रोहिंग्या शिमला में पहुंच गए, परंतु पुलिस प्रशासन इस बात से बेखबर है । मामला उजागर करने पर जांच की बात हो रही है, परंतु सवाल यह है कि, जिन रोहिंग्याआें को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जा रहा है, वे शिमला तक कैसे पहुंच गए ?
नगर निगम शिमला ने पांच वार्डो टुटू, मछयाठ, बालूगंज, कच्चीघाटी व टूटीकंडी में सफाई व्यवस्था को आउटसोर्स किया है । इसके तहत एनके कंस्ट्रक्शन कंपनी को ठेका दिया गया है । यह कंपनी जम्मू से रोहिंग्याओं को कूडा एकत्रीकरण के लिए शिमला लेकर आई है । इस कंपनी ने ४० कर्मचारी नियुक्त किए हैं । इनमें रोहिंग्याओं के अलावा प्रदेश के अन्य क्षेत्रों और उत्तर प्रदेश व बिहार से लोगों को कूडा एकत्रित करने के लिए रखा गया है । ये लोग शिमला में घर-घर जाकर कूडा उठाएंगे ।
इससे पहले कि, शिमला में सफाई कार्य शुरू हो, शहर में पहुंचे १२ रोहिंग्याओं ने रहने के लिए अस्थायी ठिकाना तलाश लिया है । अब ये लोग परिवार को लेने जम्मू गए हैं । शिमला में काफी संख्या में बांग्लादेशी भी रह रहे हैं । ये लोग निर्माणाधीन भवनों में लकडी का काम करते हैं । टाइल्स के काम में भी ये माहिर हैं ।
शिमला के उपनगर टुटू में एक रोहिंग्या ने लोगों को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का पहचान पत्र दिखाया । लोगों ने रोहिंग्या से बात करने का प्रयास किया तो उसे हिंदी समझ नहीं आ रही थी ।
शिमला के पुलिस अधीक्षक ओमापति जम्वाल का कहना है कि, पहचान पंजीकरण के बिना कोई भी शहर में नहीं रह सकता है । रोहिंग्या के आने के मामले में जांच की जाएगी ।
स्त्रोत : जागरण

Wednesday, June 6, 2018

‘हिन्दुआें की रक्षा की चुनौती का सामना कैसे करें ?’, इस उद्बोधन में मान्यवरों द्वारा रखे गए विचार !


‘७ वें अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन’ का दूसरा दिन

हिन्दुआें के उत्कर्ष के लिए मंदिरों का व्यवस्थापन हिन्दुआें के पास ही होना आवश्यक ! – जे. साईदीपक

जे. साईदीपक, कानूनी सलाहकार, इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश
मंदिरों में हिन्दुआें की एक पहचान बनाने की क्षमता है । इसीलिए विदेशी शक्तियों ने मंदिर तथा ब्राह्मणों को अपना लक्ष्य बनाया है । मंदिर जातिवाद समाप्त कर, हिन्दुआें को एकजुट बनाने का माध्यम बनना चाहिए । दुर्भाग्यवश आज जनता का विश्‍वास गंवा चुके शासनतंत्र के पास मंदिरों का व्यवस्थापन है । शासन हिन्दू धर्म को छोडकर अन्य किसी धर्म के प्रार्थनास्थलों को नहीं चलाता । मंदिरों का व्यवस्थापन योग्य न होने के कारण हिन्दुआें को मंदिरों से धर्मशिक्षा नहीं मिलती । मंदिर की संपत्ति का उपयोग हिन्दूहित के लिए नहीं किया जाता । इससे हिन्दू आर्थिक दृष्टि से निर्बल बन रहे हैं । हिन्दुआें के धर्मांतरण का यह एक बडा कारण है । मंदिरों का प्रशासन पुनः यदि हिन्दुआें के पास आ गया, तो उससे हिन्दुआें में आत्मविश्‍वास जागृत होगा तथा मंदिरों की संपत्ति का उपयोग हिन्दूहित के लिए ही किया जाएगा । इस संपत्ति का उपयोग हिन्दुआें को पारंपरिक शस्त्रविद्या, शिक्षा आदि अनेक विषय की शिक्षा देने के लिए किया जा सकता है । हमारे मठाधीश तथा संतों को, मंदिरों को स्वायत्तता प्रदान करने की मांग करनी चाहिए । मंदिर हिन्दुआें की एकता के केंद्र हैं । मंदिरों के माध्यम से हिन्दू एकजुट हो जाएं, तो किसी भी शासन को हिन्दुआें की बात सुननी ही पडेगी । इजरायल ने ६० वर्ष में अपना सम्मान पुनः प्राप्त कर लिया । सिख्खोंने भी खालसा की स्थापना के कुछ वर्ष पश्‍चात ही सफलता पाई । किसी भी समस्या के समाधान के लिए आप उस समस्या के प्रति कितना गंभीर है, यह महत्त्वपूर्ण है । अब और कितने दिनों तक हिन्दू अपनी समस्याआें को लंबित रखेंगे ? ‘आनेवाले ५ वर्षों में हम मंदिर सरकारीकरण की समस्या का समाधान ढूंढेंगे’, इस प्रकार की समयसीमा रखकर हमें आगे बढना चाहिए । गौतम बुद्धनगर, उत्तर प्रदेश के इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट के कानूनी सलाहकार अधिवक्ता जे. साईदीपक ने ‘मंदिर सरकारीकरण के विरुद्ध न्यायालयीन संघर्ष’ इस विषय पर बोलते हुए अपने विचार व्यक्त किए ।

रोहिंग्या मुसलमानों को देश में आश्रय देना खतरनाक ! – श्री. अनील धीर

श्री. अनील धीर, राष्ट्रीय सचिव, भारत रक्षा मंच, ओडिशा
उपद्रवकारी रोहिंग्या मुसलमानों का भारत में तथा वह भी जम्मू जैसे क्षेत्र में पुनर्वास करने के पीछे एक बडा षड्यंत्र है । ये रोहिंग्या मुसलमान प्रशिक्षित आतंकियों की अपेक्षा अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं । मूलरूप से दंगाई वृत्ति के इन लोगों ने जम्मू का हवाई अड्डा, सैन्यशिविर, रेलस्थानक, महत्त्वपूर्ण पुल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास अपना अवैध डेरा बना लिया है । हैदराबाद तथा देश के अनेक स्थानों में ये रोहिंग्या मुसलमान रह रहे हैं । संकटकाल में ये रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए संकट बन सकते हैं, इस विषय में केंद्र तथा अनेक राज्यों की गुप्तचर विभागों ने केंद्र शासन को सचेत किया है; परंतु शासन अब भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है । अमेरिका चाहे अपने देश में सबसे अधिक शरणार्थियों को आश्रय देने की बात करता हो; परंतु वास्तव में भारत में ही सर्वाधिक शरणार्थी रह रहे हैं । ऐसा होेते हुए भी भारत अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी अनुबंध पर हस्ताक्षर करे, इसके लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ भारत पर दबाव बना रहा है । बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान आदि देश रोहिंग्याआें को शरण नहीं दे रहे हैं; इसलिए इन लोगों का तांता भारत आ रहा है । ओडिशा के भारत रक्षा मंच के राष्ट्रीय सचिव श्री. अनिल धीर ने यह मत व्यक्त किया । श्री. धीर ‘रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ तथा उसका समाधान’, इस विषयपर अपने विचार रख रहे थे ।

संकटकाल में अपने धर्मबंधुआें की सहायता करना हमारा कर्तव्य ! – श्री. मनोज खाडये

श्री. मनोज खाडये, समन्वयक, हिन्दू जनजागृति समिति, पश्‍चिम महाराष्ट्र
सप्तर्षि जीवनाडीपट्टी में की भविष्यवाणी के अनुसार आनेवाले समय में ७० से ७५ देशों में आपातकालीन घटनाएं होगी तथा उससे अराजक की स्थिति बनेगी । भारत में भी ऐसी स्थिति बन सकती है । ऐसे समय में हमें धर्मबंधु होने के नाते हिन्दुआें की सहायता करनी है । उनकी सहायता के लिए जाना, हमारा कर्तव्य होगा । आपदा किसी भी रूप में आ सकती है । कुछ स्थानों पर जलप्रलय, भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाएं आ सकती हैं अथवा युद्ध और दंगे हो सकते हैं । ऐसी आपदाआें का सामना करने के लिए हमें अभी से तैयारी आरंभ करनी है । आपदा यदि सौम्य हो, तो हम अपने स्तर पर पीडितों की सहायता कर सकते हैं; परंतु आपदा यदि तीव्र स्वरूप की होगी, तो उसके लिए हमें सरकार अथवा सेना की सहायता लेनी पडेगी । इसके पूर्व हमने उत्तराखंड, नेपाल, चेन्नई जैसे स्थानों पर आपातकालीन सहायता की है ।

हिन्दुआें में साम, दाम, दंड तथा भेद इन माध्यमों से शौर्यजागरण की आवश्यकता ! – श्री. अरविंद जैन

श्री. अरविंद जैन, प्रांतीय संस्कृति प्रमुख, भक्ति आंदोलन मंच, उत्तर प्रदेश
जिन हिन्दुआें ने विश्‍व पर राज्य किया, वो हिन्दू आज संघर्ष से बचने का प्रयास कर रहे हैं । उन्हें बचाव की नीति त्यागकर आक्रमण नीति अपनानी चाहिए । हमारे शासनकर्ता केवल हिन्दुआें की समस्याआें के विषय में ही बताते रहते हैं; परंतु हिन्दुआें को क्या करना चाहिए, यह नहीं बताते । हमें हिन्दुआें में व्याप्त शौर्य को जगाना आवश्यक है । शौर्यजागरण के लिए प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष इन दोनों मार्गों को अपनाने की आवश्यकता है । उनमें से एक है शत्रु के साथ दो हाथ करना तथा दूसरा प्रयास यह कि शत्रु को निर्बल बनाकर स्वयं बलवान बनना । शत्रु को निर्बल बनाने के लिए हिन्दुआें को निम्न संकल्प करने चाहिए ।
१. मुसलमान कलाकारों के चलचित्र नहीं देखेंगे ।
२. लव जिहाद से बचने के लिए किसी भी अराजक तत्त्व को घर में आश्रय नहीं देंगे ।
३. अपने धर्मस्थलों को छोडकर अन्य किसी धर्मस्थल पर अपना सर नहीं झुकाएंगे ।
४. प्रत्येक क्षेत्र के साधु-संत प्रवचनों द्वारा केवल ईश्‍वर की लीलाएं ही नहीं, अपितु उनके क्षात्रयुक्त विचारों का भी प्रचार करें, इसके लिए उन्हें निवेदन सौंपना ।